शब्दों के गुरु को समर्पित — अखिल भारतीय साहित्य परिषद का गुरु पूर्णिमा समारोह

लखनऊ

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद, लखनऊ महानगर इकाई ने एक गरिमामय साहित्यिक समारोह का आयोजन किया। पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट 

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद, लखनऊ महानगर इकाई ने एक गरिमामय साहित्यिक समारोह का आयोजन किया, जिसमें साहित्य की साधना, गुरु की गरिमा और भाषा की मर्यादा पर विमर्श हुआ।

मुख्य अतिथि श्रीधर पराड़कर ने कहा कि “साहित्यकार की सबसे बड़ी तपस्या शब्द साधना है। शब्द जब तपकर निकलते हैं तो वे केवल वाक्य नहीं रहते, वे पाठक की आत्मा को झंकृत करने वाली शक्ति बन जाते हैं।” उन्होंने वीर सावरकर के लेखन को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्य में शब्दों का चयन उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना किसी तपस्वी के लिए उसकी साधना।

विशिष्ट अतिथि पवन पुत्र बादल और परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष विजय त्रिपाठी ने गुरु की परंपरा पर बात करते हुए कहा कि “गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं, अपितु वह प्रकाश है जो आत्मा की राह प्रशस्त करता है। शिक्षक से आगे बढ़कर गुरु वह है जो संस्कारों से आत्मा को गढ़ता है।”

राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील चंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ ने कहा कि “हर साहित्यकार को अपने भीतर का गुरु जागृत करना चाहिए। जब लेखनी गुरु की भांति मार्गदर्शक बनती है, तब समाज भी उसके शब्दों से दिशा पाता है।”

इस अवसर पर राजवीर रतन को परिषद का मीडिया प्रमुख घोषित किया गया। साथ ही, श्रीधर पराड़कर द्वारा रचित चर्चित उपन्यास ‘तत्वमसि’ के अंशों का भावपूर्ण वाचन किया गया, जिसने उपस्थित जनों को अध्यात्म, दर्शन और साहित्य के मध्य एक गूढ़ संवाद की अनुभूति कराई।

समारोह में साहित्य, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने भाग लिया। प्रमुख रूप से हरिनाथ शिदे, संजीव श्रीवास्तव, मनमोहन बाराकोटी और डा. बलजीत कुमार श्रीवास्तव की उपस्थिति ने आयोजन को वैचारिक गहराई प्रदान की।

गुरु पूर्णिमा के इस अवसर पर आयोजित यह साहित्यिक समागम केवल एक आयोजन नहीं था, यह “साहित्य को साधना और गुरु को चेतना” मानने वाले रचनाकारों की एक संगठित पुकार थी। अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने इस भव्य कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया कि शब्दों की आराधना ही सच्ची गुरु-भक्ति है।

 

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