बुलंदशहर: यूरिया कालाबाजारी मामले में जांच के बजाय इनाम? AR कोऑपरेटिव को मिला मेरठ-गाजियाबाद का अतिरिक्त प्रभार

बुलंदशहर

बुलंदशहर उत्तर प्रदेश के सहकारिता विभाग में एक चौंकाने वाला प्रशासनिक फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

बुलंदशहर उत्तर प्रदेश के सहकारिता विभाग में एक चौंकाने वाला प्रशासनिक फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है। बुलंदशहर में हाल ही में हुए बड़े यूरिया कालाबाजारी घोटाले में जवाबदेही तय होने और जांच पूरी होने से पहले ही, यहाँ के सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिताअमित त्यागी को मेरठ और गाजियाबाद जैसे दो बेहद महत्वपूर्ण जिलों का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। इस फैसले के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

क्या था यूरिया कालाबाजारी का मामला?

यह पूरा मामला बीते 10 मई 2026 को बुलंदशहर के अनूपशहर क्षेत्र में सामने आया था।

1575 कट्टा यूरिया बरामद: चेकिंग के दौरान अधिकारियों ने सरकारी यूरिया से लदा एक ट्रक पकड़ा था, जिसमें कुल 1575 कट्टे यूरिया भरा था।

तस्करी का आरोप: आरोप था कि इस यूरिया को किसानों के निर्धारित वितरण नेटवर्क से हटाकर ब्लैक मार्केट (कालाबाजारी) में खपाने के लिए ले जाया जा रहा था। इस घटना के बाद कृषि और सहकारिता विभाग के स्थानीय अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही थी और मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग उठ रही थी।

जांच अधर में, मिल गई बड़ी जिम्मेदारी
हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर घोटाले की कड़ियां अभी सुलझी भी नहीं थीं कि विभाग ने अमित त्यागी का कद और बढ़ा दिया। सहकारिता विभाग के नजरिए से मेरठ और गाजियाबाद दोनों ही जिले राजस्व और प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और वीवीआईपी माने जाते हैं।

सियासी रसूख की चर्चा

विभागीय गलियारों और सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा तेज है कि अधिकारी को सूबे के एक प्रभावशाली मंत्री का करीबी संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते जांच के घेरे में आने के बजाय उन्हें इन दो बड़े जिलों की कमान सौंप दी गई। हालांकि, इस राजनीतिक कनेक्शन पर शासन या विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

किसान संगठनों और विपक्ष ने खोला मोर्चा
इस फैसले को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने इस पर तीखी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि जहाँ एक तरफ यूरिया की किल्लत से किसान परेशान हैं, वहीं दूसरी तरफ कालाबाजारी के मामले में बिना क्लीन चिट मिले अधिकारी को पुरस्कृत करना समझ से परे है।

प्रशासनिक पक्ष

दूसरी ओर, सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का तर्क है कि यह तैनाती विशुद्ध रूप से प्रशासनिक आवश्यकता और रिक्त पदों को भरने के तहत की गई है, इसका अनूपशहर में चल रही जांच प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं है। अब देखना यह है कि इस प्रशासनिक उठापटक के बीच यूरिया घोटाले की निष्पक्ष जांच हो पाती है या मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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