महराजगंज

महराजगंज जनपद इक्कीसवीं सदी में विज्ञान और तकनीकी प्रगति के दावों के बीच ग्रामीण अंचलों में अंधविश्वास और अजीबोगरीब मान्यताओं की जड़ें अब भी गहरी हैं।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज़ 24 की खास रिपोर्ट।

महराजगंज जनपद इक्कीसवीं सदी में विज्ञान और तकनीकी प्रगति के दावों के बीच ग्रामीण अंचलों में अंधविश्वास और अजीबोगरीब मान्यताओं की जड़ें अब भी गहरी हैं। जनपद के रुदलापुर गांव में नागपंचमी के अवसर पर सामने आने वाला एक ऐसा ही कथित घटनाक्रम चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है। यहां हर तीन साल में नागपंचमी पर बड़ी संख्या में ग्रामीण एक बुजुर्ग के शरीर में ‘महिषासुर’ के प्रवेश का दावा करते हुए अंधविश्वास के मेले में जुटते हैं।
1975 से जारी परंपरा का दावा, बुजुर्ग खाते हैं भूसा और घास
ग्रामीणों के अनुसार, यह कथित सिलसिला वर्ष 1975 से चला आ रहा है।
असामान्य व्यवहार: ग्रामीणों का दावा है कि नागपंचमी के दिन गांव के लगभग 70 वर्षीय बुजुर्ग बुद्धिराम के शरीर में ‘महिषासुर’ का प्रवेश होता है।
पशुओं का चारा खाने की होड़: स्थानीय समय माता मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद बुजुर्ग कथित रूप से नाद में रखे पानी, घास और भूसे को जानवरों की तरह खाने लगते हैं।
अतिशयोक्तिपूर्ण दावे: मौके पर मौजूद लोग दावा करते हैं कि वे कई हौदियों में रखा भूसा तक खा जाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु उन्हें केला, लड्डू के साथ-साथ घास और भूसा खिलाते नजर आते हैं।
मनौतियों के नाम पर उमड़ता है ग्रामीणों का हुजूम
हर तीन साल में आयोजित होने वाले इस घटनाक्रम को देखने के लिए आसपास के दर्जनों गांवों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ग्रामीणों में यह अंधविश्वास फैला हुआ है कि यहां आने और बुजुर्ग का यह रूप देखने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के चलते यहां हर बार भीड़ और चढ़ावे का दायरा बढ़ता जा रहा है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चिकित्सकीय जांच की दरकार
इस पूरे घटनाक्रम ने आस्था के नाम पर पनप रहे अंधविश्वास पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं
कोई वैज्ञानिक या चिकित्सकीय आधार नहीं: इंसान के शरीर में किसी पौराणिक पात्र के प्रवेश का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
मनोवैज्ञानिक या चिकित्सीय पहलू: विशेषज्ञों के अनुसार, गैर-खाद्य वस्तुएं खाने का यह असामान्य व्यवहार किसी मनोवैज्ञानिक विकार (जैसे ‘पिका विकार’ या अन्य मानसिक स्थिति) अथवा न्यूरोलॉजिकल समस्या का परिणाम हो सकता है।
जांच की आवश्यकता: ऐसे असामान्य व्यवहार को किसी दैवीय या अलौकिक शक्ति से जोड़ने के बजाय निष्पक्ष चिकित्सकीय परीक्षण और वैज्ञानिक विश्लेषण कराया जाना अत्यंत जरूरी है।
आस्था और अंधविश्वास की धुंधली लकीर के बीच रुदलापुर का यह मामला आधुनिक समाज को सोचने पर मजबूर करता है कि वैज्ञानिक युग में भी अज्ञानता और कुप्रथाओं पर प्रशासनिक व सामाजिक जागरूकता की कितनी बड़ी दरकार है।
रुदलापुर में हर तीन साल बाद जुटने वाली भीड़, ‘महिषासुर’ के प्रवेश का दावा और भूसा खाने की कथित घटना कई सवाल खड़े करती है। क्या यह आस्था है? अंधविश्वास है? सामूहिक विश्वास का प्रभाव है? या इसके पीछे कोई चिकित्सकीय कारण है?
इन सवालों का जवाब केवल दावे या मान्यता से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जांच से ही मिल सकता है।
Voice Of News 24 Channel का उद्देश्य किसी की धार्मिक आस्था या भावना को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि आस्था और अंधविश्वास के बीच के अंतर को सामने लाना है। विज्ञान के इस दौर में हर असामान्य घटना को चमत्कार मानने के बजाय उसके पीछे की सच्चाई जानना ही जागरूक समाज की पहचान है।
लखनऊ:विनोद तावड़े बने बीजेपी के उत्तर प्रदेश प्रभारी, जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सौंपी गई सह-प्रभारी की जिम्मेदारी pic.twitter.com/FzRiSvSzlO
— Voice of News 24 (@VOfnews24) August 18, 2026













