सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु में “योग विरासत” विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ दो दिवसीय भव्य आयोजन

कपिलवस्तु

सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु में दो दिवसीय “योग विरासत” विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का किया गया आयोजन। इस दौरान क्या कुछ हुआ खास? पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट

सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु में दो दिवसीय “योग विरासत” विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन भव्यता के साथ किया गया। इस दो दिवसीय संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रख्यात प्राध्यापकों,शोधार्थियों एवं छात्रों ने सक्रिय भागीदारी की और योग के विविध आयामों पर सारगर्भित विमर्श प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी के प्रमुख विषयों में शामिल थे – योग और स्वास्थ्य,योग और विज्ञान,योग हमारी धरोहर,पतंजलि के योगसूत्र,मूर्तिकला और स्थापत्य में योग, योग से रोग निवारण, विद्वानों ने अपने वक्तव्यों में योग के सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और वैश्विक महत्व को रेखांकित किया तथा इसे मानवता की साझा विरासत के रूप में प्रस्तुत किया।

इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की आयोजक प्रो. नीता यादव (अधिष्ठाता छात्र कल्याण, अधिष्ठाता कला संकाय एवं विभागाध्यक्ष, प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग) रहीं। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि थीं प्रो. सुमन जैन, तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे प्रो. सुवर्ण लाल वज्राचार्य (कुलपति, लुंबिनी बुद्धिस्ट यूनिवर्सिटी, नेपाल)।
संगोष्ठी की अध्यक्षता माननीय कुलपति प्रो. कविता शाह ने की।
नेपाल से पधारे कुलसचिव डॉ. तिलक राम आचार्य, प्रो. अरविंद सिंह, तथा डॉ. राजेन्द्र घिमिरे समेत कई अंतरराष्ट्रीय विद्वान भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। संगोष्ठी में सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत शोध आलेखों को विशेष सराहना मिली।
प्रथम दिवस में दो बौद्धिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें विद्वानों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। द्वितीय दिवस की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में प्रातः योग क्रियाओं के अभ्यास से हुई, जिसमें विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्र एवं आम जन भागीदार बने।
समापन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. कविता शाह जी एवं गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में श्री राकेश कुमार तिवारी (Founder & CEO, Logic Squar AB, Stockholm, Sweden) ने प्रतिभाग किया। समापन के अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।
यह संगोष्ठी न केवल योग की प्राचीन विरासत को समझने का मंच बनी, बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसके लाभों को भी रेखांकित किया गया, जिससे यह आयोजन एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया।

 

 

 

 

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