नरौरा (बुलंदशहर)
बुलंदशहर जनपद के डिबाई क्षेत्र के राजघाट, नरौरा और रामघाट में गंगा संरक्षण की एक नई कहानी लिखी जा रही है।पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

बुलंदशहर जनपद के डिबाई क्षेत्र के राजघाट, नरौरा और रामघाट में गंगा संरक्षण की एक नई कहानी लिखी जा रही है। भारतीय वन्य जीव संस्थान (WII) की ‘जलज परियोजना’ के तहत संचालित ‘जलज सफारी’ न केवल गंगा के जलीय जीवों को बचाने का माध्यम बनी है, बल्कि इसने स्थानीय नाविकों के जीवन में भी समृद्धि का संचार किया है।
नाविक बने गंगा के ‘गाइड’ और रक्षक
जलज सफारी के माध्यम से गंगा की लहरों पर सैर करने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अब केवल नौका विहार ही नहीं मिलता, बल्कि उन्हें प्रकृति की अनमोल विरासत से रूबरू होने का मौका भी मिलता है।
जलीय जीवों का ज्ञान: प्रशिक्षित नाविक पर्यटकों को गंगा में पाए जाने वाले डॉल्फिन, कछुओं और अन्य दुर्लभ जलीय जीवों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं।
संरक्षण की अपील: सफारी के दौरान लोगों को गंगा को स्वच्छ रखने और प्रदूषण न फैलाने के प्रति जागरूक किया जाता है।
बढ़ रही है नाविकों की आय
इस परियोजना ने पारंपरिक नाविकों को एक नया प्रोफेशनल स्वरूप दिया है। वर्तमान में इस क्षेत्र में सफारी का नेटवर्क इस प्रकार है।रामघाट 04 जलज सफारी ,नरौरा गांधी घाट 02 जलज सफारी,राजघाट 02 जलज सफारी
सफारी के प्रति पर्यटकों के बढ़ते आकर्षण के कारण नाविकों की दैनिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। अब वे केवल एक मल्लाह नहीं, बल्कि ‘इको-टूरिज्म गाइड’ के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं।
प्रशिक्षण से मिली मजबूती
जलज परियोजना के तहत नाविकों को केवल संसाधन ही नहीं दिए गए, बल्कि उन्हें भारतीय वन्य जीव संस्थान द्वारा विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इस प्रशिक्षण में उन्हें जलीय जीवों के व्यवहार, प्राथमिक चिकित्सा और पर्यटकों के साथ संवाद करने के तरीके सिखाए जाते हैं, जिससे उनकी भूमिका और अधिक प्रभावी हो गई है।
इको-टूरिज्म का उभरता मॉडल
नरौरा और आसपास के घाटों पर संचालित यह मॉडल यह सिद्ध करता है कि पर्यावरण संरक्षण और आजीविका साथ-साथ चल सकते हैं। ‘जलज सफारी’ न केवल गंगा की शुचिता को बनाए रखने में मददगार साबित हो रही है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक स्थायी इको-टूरिज्म मॉडल के रूप में उभर रही है।
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