बलिया के शेखपुर में निकली 35 किलो चांदी की ऐतिहासिक ताजिया, साल में सिर्फ एक दिन होते हैं दीदार

बलिया

बलिया जनपद के तहसील क्षेत्र के ग्राम शेखपुर में मुहर्रम के अवसर पर अकीदत और सांप्रदायिक सौहार्द का एक अनूठा नजारा देखने को मिला। पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

बलिया जनपद के तहसील क्षेत्र के ग्राम शेखपुर में मुहर्रम के अवसर पर अकीदत और सांप्रदायिक सौहार्द का एक अनूठा नजारा देखने को मिला। यहां हसन रिजवी के आवास के समीप स्थित मजार परिसर में पूरे वर्ष सुरक्षित रखी जाने वाली 35 किलो वजनी चांदी की ऐतिहासिक ताजिया को 10वीं मुहर्रम (यौम-ए-आशूरा) के दिन पारंपरिक ढंग से नगर भ्रमण के लिए निकाला गया। यह भव्य ताजिया अपने निर्धारित पारंपरिक मार्गों से होते हुए कर्बला पहुंची, जहां मुहर्रम का जुलूस संपन्न हुआ।

ताजिया के मुख्य संरक्षक हसन रिजवी ने बताया कि इस अलौकिक ताजिया के दीदार और जियारत के लिए बलिया जनपद के अलावा उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्य बिहार के विभिन्न जिलों से हर साल सैकड़ों की संख्या में अकीदतमंद यहां पहुंचते हैं। सुबह से ही दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं और पूरा क्षेत्र ‘या हुसैन’ की सदाओं से गुंजायमान हो उठता है।

हर साल जुड़ती है 100 ग्राम चांदी, वर्तमान कीमत लाखों में
हसन रिजवी के अनुसार, इस ऐतिहासिक ताजिया की वर्तमान बाजार कीमत करीब 76.65 लाख से 84 लाख रुपये के बीच आंकी गई है। इस ताजिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हर साल परंपरा के अनुसार लगभग 100 ग्राम अतिरिक्त चांदी जोड़ी जाती है, और इस वर्ष भी यह रस्म पूरी की गई। पूरे साल में केवल मुहर्रम के दिन ही आम जनता को इसके दर्शन का सौभाग्य मिलता है, बाकी के 364 दिन इसे पूरी अकीदत और सुरक्षा के साथ मजार परिसर में ढंककर रखा जाता है।

सच्चे मन से मांगी मन्नतें होती हैं पूरी

मान्यता है कि इस पवित्र मजार पर जो भी अकीदतमंद सच्चे दिल से मन्नत मांगता है, उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। लोग यहां चादरपोशी कर फातिहा पढ़ते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि के साथ-साथ देश में अमन-चैन और खुशहाली की दुआ मांगते हैं। यही अटूट विश्वास हर साल दूर-दराज से लोगों को यहां खींच लाता है।

धार्मिक पहचान के साथ सामाजिक एकता की मिसाल

जुलूस और भ्रमण संपन्न होने के बाद धार्मिक रीति-रिवाजों के तहत चांदी की इस ताजिया को पुनः अगले एक साल के लिए सम्मानपूर्वक सुरक्षित ढंक दिया गया। इस अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा ने शेखपुर गांव को पूरे पूर्वांचल में एक विशिष्ट धार्मिक पहचान दिलाई है। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे आज की युवा पीढ़ी भी उसी अनुशासन और शिष्टाचार के साथ निभा रही है। खास बात यह है कि मुहर्रम के इस मौके पर सभी समुदायों के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, जिससे यह स्थल सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का एक बड़ा प्रतीक बनकर उभरता है।

 

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