बलिया: प्रेम का पैगाम देने वाला गुलाब खतरे में, चमेली की चमक भी पड़ी फीकी; अफसरों की चुप्पी बुझा देगी सिकंदरपुर की ख्याति का दीपक

बलिया

फूलों की नगरी के नाम से मशहूर बलिया के सिकंदरपुर में मुरझा रहा कारोबार, किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं, पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट


“प्रेम के पैगाम का प्रतीक” माना जाने वाला गुलाब और “चमेली की खुशबू” से महकने वाला सिकंदरपुर आज अपनी पहचान खोने के कगार पर है। फूलों की खेती के लिए देशभर में मशहूर बलिया का यह कस्बा अब बदहाली के दौर से गुजर रहा है। जिम्मेदारों की चुप्पी और उपेक्षा ने यहां के फूल उत्पादकों की कमर तोड़ दी है।

क्यों मुरझा रहा है सिकंदरपुर का गुलाब?

बाजार का अभाव: किसानों को फूलों का उचित दाम नहीं मिल पा रहा, जिससे किसानों की मेहनत नीलाम हो जा रही है,जो उनके हौसले के पर को खुलने नहीं दे रही।

सरकारी मदद नदारद: न तो कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था है और न ही फूलों को बड़े बाजार तक पहुंचाने के लिए सरकारी परिवहन की सुविधा। गर्मी में टन के हिसाब से फूल खराब हो जाते हैं, जिससे किसानों का सिस्टम से भरोसा और अपने मेहनत से उम्मीद टूट चुकी है।

3. कीट-रोग का प्रकोप: बदलते मौसम और जानकारी के अभाव में फसलों में रोग लग रहे हैं। कृषि विभाग की तरफ से कोई जागरूकता अभियान नहीं चलाया जा रहा, जिससे इन फसलों की सुरक्षा कर उत्पादन में वृद्धि किया जा सके।

चमेली की चमक भी पड़ी फीकी

कभी इत्र और माला बनाने के लिए दूर-दूर से व्यापारी सिकंदरपुर की चमेली खरीदने आते थे। आज हालात ये हैं कि लागत तक नहीं निकल पा रही। किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं। कई किसानों ने घाटे के कारण फूलों की खेती छोड़कर धान-गेहूं की तरफ रुख कर लिया है, जो सिकंदरपुर के प्रसिद्धी पर किसी बड़े जोखिम से कम नहीं है।

बुझ सकती है ख्याति की लौ

स्थानीय फूल उत्पादक संघ के लोगों का कहना है कि अगर जल्द ही प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने ध्यान नहीं दिया तो वह दिन दूर नहीं जब सिकंदरपुर से “फूलों की नगरी” का तमगा छिन जाएगा। यह सिर्फ किसानों का नहीं, बल्कि जिले की पहचान और प्रसिद्धी के अस्तित्व का सवाल है।

प्रशासन से मांग

किसानों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि सिकंदरपुर में एक आधुनिक फूल मंडी बनाई जाए, कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था हो और किसानों को सीधे बड़े शहरों के बाजार से जोड़ा जाए। साथ ही कीटनाशक व तकनीकी मदद के लिए कृषि वैज्ञानिकों की टीम भेजी जाए।

अगर अब भी अफसरों की नींद नहीं टूटी तो प्रेम के पैगाम का यह जरिया हमेशा के लिए खामोश हो जाएगा।

 

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