महराजगंज: शक्तिपीठ लेहड़ा देवी मंदिर में आस्था का सैलाब; पांडवकालीन इतिहास और नाविक की कथा से जुड़ा है माँ का दरबार

फरेंदा

चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर जनपद महराजगंज के फरेंदा स्थित आदिशक्ति माँ लेहड़ा देवी के मंदिर में भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर जनपद महराजगंज के फरेंदा स्थित आदिशक्ति माँ लेहड़ा देवी के मंदिर में भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। घने जंगलों के बीच स्थित इस भव्य दरबार में न केवल उत्तर प्रदेश और बिहार, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल से भी लाखों श्रद्धालु अपनी अरदास लेकर पहुँच रहे हैं।

अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने की थी आराधना

इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इसी स्थान पर माँ भगवती की कठोर तपस्या की थी। कहा जाता है कि जब माता द्रौपदी ने अपना आंचल फैलाकर विजय का वरदान मांगा, तब माँ ने प्रसन्न होकर पांडवों को महाभारत के युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद दिया था। आज भी भक्त यहाँ उसी श्रद्धा के साथ मन्नतें मांगते हैं।

मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, हजारों साल पहले यहाँ एक विशाल नदी बहती थी। एक दिन माँ भगवती ने एक सुंदर किशोरी का रूप धारण कर एक नाविक से नदी पार कराने का आग्रह किया। नाविक माँ की सुंदरता पर मोहित हो गया और उसने मर्यादा लांघने का प्रयास किया। इस पर कुपित होकर माँ ने नाविक और उसकी नाव के साथ उसी क्षण जलसमाधि ले ली। वह नदी आज भी माँ के क्रोध और शक्ति के प्रतीक के रूप में वहां प्रवाहित होती है।

किन्नरों के नृत्य की अनोखी परंपरा

लेहड़ा देवी मंदिर की एक विशिष्ट परंपरा इसे अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाती है। यहाँ मान्यता है कि जो भी भक्त अपने आंचल में किन्नरों से नृत्य करवाता है, माँ उसकी झोली खुशियों से भर देती हैं। यही कारण है कि मंदिर परिसर में चौबीसों घंटे नृत्य का आयोजन होता रहता है। इसके अतिरिक्त, यहाँ बड़ी संख्या में मुंडन संस्कार और शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्यक्रम भी संपन्न होते हैं।

नेपाल और भारत के कोने-कोने से पहुँच रहे भक्त

सुरक्षा और सुविधा के दृष्टिगत प्रशासन ने यहाँ व्यापक इंतजाम किए हैं। जंगल के बीच स्थित होने के बावजूद श्रद्धालुओं के हुजूम को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि माँ के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता।

 

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