बुलंदशहर: हाईकोर्ट की सख्ती का असर, मुठभेड़ों के ‘सिलसिले’ पर लगा ब्रेक

बुलंदशहर

बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद बुलंदशहर जिले में मुठभेड़ों की रफ्तार अचानक थम गई है। पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद बुलंदशहर जिले में मुठभेड़ों की रफ्तार अचानक थम गई है। पिछले नौ वर्षों से जिले में लगभग हर दूसरे दिन होने वाली मुठभेड़ और एक जैसी ‘पुलिसिया थ्योरी’ पर अब जांच और जवाबदेही का भारी दबाव है।

सवालों के घेरे में पुरानी कार्यशैली

जिले में अब तक हुए सैकड़ों एनकाउंटर में एक ही पैटर्न देखा जाता रहा—बदमाश के घुटने के नीचे गोली लगना और मौके पर एसओजी टीम की मौजूदगी। विशेषकर सिकंदराबाद कोतवाली क्षेत्र में मुठभेड़ों की संख्या सर्वाधिक दर्ज की गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुरस्कार या पदोन्नति के लिए पुलिस कानून हाथ में नहीं ले सकती।

हाईकोर्ट की नई गाइडलाइंस

अदालत ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं:

प्रत्येक मुठभेड़ की अनिवार्य एफआईआर और स्वतंत्र एजेंसी (जैसे CBCID) से जांच।

घायल आरोपी का मजिस्ट्रेट के सामने तत्काल बयान दर्ज करना।

जांच पूरी होने तक शामिल अधिकारियों को वीरता पुरस्कार या आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन पर रोक।

बढ़ा जवाबदेही का दबाव

कोर्ट की सख्ती के बाद अब पुलिस महकमे में सतर्कता का माहौल है। फर्जी मुठभेड़ के संदेह पर पीड़ित पक्ष सीधे सेशंस जज से शिकायत कर सकते हैं, जिससे अधिकारियों पर अवमानना की तलवार लटक रही है। अब पुलिस की प्राथमिकता ‘गोली’ के बजाय कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजी साक्ष्यों पर टिक गई है।

 

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