बुलंदशहर

बुलंदशहर जनपद के अहमदगढ़ कभी गांव-कस्बों की पहचान हुआ करती घर की मुंडेर पर बैठने वाले कौओं की ‘कांव-कांव’ अब धीरे-धीरे खामोश होती जा रही है। सुबह होते ही गलियों, खेतों और घरों की छतों पर गूंजने वाली कौओं की आवाज अब बमुश्किल ही सुनाई देती है।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज़ 24 की खास रिपोर्ट।

बुलंदशहर जनपद के अहमदगढ़ कभी गांव-कस्बों की पहचान हुआ करती घर की मुंडेर पर बैठने वाले कौओं की ‘कांव-कांव’ अब धीरे-धीरे खामोश होती जा रही है। सुबह होते ही गलियों, खेतों और घरों की छतों पर गूंजने वाली कौओं की आवाज अब बमुश्किल ही सुनाई देती है। आलम यह है कि पितृ पक्ष के दौरान भी पितरों को भोजन का पहला ग्रास अर्पित करने के लिए कौए आसानी से नहीं मिल रहे हैं।
हिंदू परंपरा में कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में लोग कौए को भोजन कराकर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। दौलतपुर खुर्द के पंडित अंशु शर्मा के अनुसार, कौआ उपलब्ध न होने की स्थिति में परंपरा के अनुसार कई लोग अब पहला ग्रास गाय को अर्पित करने लगे हैं।
जानकारों का मानना है कि बढ़ता शहरीकरण, पेड़ों की लगातार घटती संख्या और प्रदूषण पक्षियों के प्राकृतिक आवासों को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं। पर्यावरण में हो रहे बदलावों के कारण पक्षियों के लिए भोजन, आश्रय और प्रजनन की अनुकूल परिस्थितियां लगातार कम होती जा रही हैं, जिसका सीधा असर कौओं की संख्या पर पड़ा है। यदि समय रहते इनके प्राकृतिक आवासों और पेड़ों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कौए सिर्फ कहानियों और तस्वीरों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे।
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— Voice of News 24 (@VOfnews24) October 4, 2026












