लखनऊ
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बड़ा विधायी कदम उठाते हुए अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में पारित ‘उत्तर प्रदेश मदरसा विधेयक-2016’ को औपचारिक रूप से वापस लेने का निर्णय लिया है।पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बड़ा विधायी कदम उठाते हुए अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में पारित ‘उत्तर प्रदेश मदरसा विधेयक-2016’ को औपचारिक रूप से वापस लेने का निर्णय लिया है। इस फैसले के साथ ही मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को मिलने वाली वह विशेष कानूनी सुरक्षा समाप्त हो गई है, जो उन्हें सामान्य जांच और पुलिस कार्रवाई से बचाती थी।
क्या था सपा सरकार का 2016 का विधेयक? वर्ष 2016 में तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार ने इस विधेयक को विधानसभा से पारित कराया था। इसका मुख्य उद्देश्य मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान को वैधानिक ढांचा देना था, लेकिन इसमें कुछ ऐसी धाराएं शामिल की गई थीं जो उन्हें विशेष कानूनी कवच प्रदान करती थीं। इस कानून के तहत नियमों के उल्लंघन के बावजूद किसी कर्मचारी के खिलाफ सीधी पुलिस कार्रवाई करना बेहद कठिन था।
राष्ट्रपति से वापस लौटा विधेयक इस विधेयक के कानूनी पेचों को देखते हुए साल 2016 में तत्कालीन राज्यपाल ने इस पर आपत्ति जताई थी और इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। केंद्र सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय ने इस पर गंभीर आपत्तियां जताईं और स्पष्ट किया कि कोई भी कानून संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ नहीं हो सकता। अंततः राष्ट्रपति ने इसे पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया और केंद्र ने निर्देश दिया कि संविधान के दायरे में नया विधेयक लाया जाए।
“कानून से ऊपर कोई नहीं”– योगी कैबिनेट का रुख योगी कैबिनेट ने अब इस पुराने विधेयक को औपचारिक रूप से निरस्त करने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है।
सरकार का तर्क है कि:
समान नियम: किसी भी विशेष वर्ग के लिए कानून से ऊपर विशेष छूट देना न्यायसंगत नहीं है।
सीधी कार्रवाई: अब यदि कोई मदरसा शिक्षक या कर्मचारी कानून का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो पुलिस अन्य सरकारी कर्मचारियों की तरह ही उनके खिलाफ सीधे कानूनी कार्रवाई कर सकेगी।
पारदर्शिता: इस कदम से मदरसा शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और अनुशासन सुदृढ़ होगा।
विपक्ष की प्रतिक्रिया पर नजर योगी सरकार के इस फैसले को ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) की दिशा में एक और वैचारिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। जहां सत्ता पक्ष इसे समानता की दिशा में बड़ा सुधार बता रहा है, वहीं विपक्षी गलियारों में इस पर तीखी प्रतिक्रिया होने की संभावना है।
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