वाराणसी: ज्ञानवापी बवाल मामले में 21 साल बाद आया ऐतिहासिक फैसला, MP-MLA कोर्ट ने भाजपा व हिंदूवादी नेताओं समेत सभी आरोपियों को किया दोषमुक्त

वाराणसी

वाराणसी जनपद के धर्मनगरी काशी के बहुचर्चित ज्ञानवापी परिसर में दो दशक पहले हुए भीषण बवाल और सांप्रदायिक तनाव के मामले में अदालत का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

वाराणसी जनपद के धर्मनगरी काशी के बहुचर्चित ज्ञानवापी परिसर में दो दशक पहले हुए भीषण बवाल और सांप्रदायिक तनाव के मामले में अदालत का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। वाराणसी की विशेष MP-MLA कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव और लंबी कानूनी जिरह के बाद मामले में नामजद सभी भाजपा नेताओं, हिंदूवादी संगठनों के पदाधिकारियों और मुस्लिम व्यापारियों को बाइज्जत बरी (दोषमुक्त) कर दिया है। न्यायालय के इस फैसले से 21 वर्षों से मुकदमे की आग में झुलस रहे आरोपियों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिली है।

न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह की कोर्ट ने सुनाया सुखद फैसला

प्राप्त विवरण के अनुसार, MP-MLA कोर्ट के माननीय न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने दोनों पक्षों के गवाहों के बयानों और पटल पर रखे गए साक्ष्यों का गहन परीक्षण करने के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह सिद्ध नहीं होते हैं।

इस मुकदमे में बरी हुए वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता गुलशन कपूर ने फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए बताया, 21 वर्षों तक चली एक लंबी कानूनी लड़ाई, तीखी बहस, जिरह और बयानों के बाद आखिरकार सच की जीत हुई है और हमें न्याय मिला है।”

वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अकाट्य तर्कों से पलटा पासा

बचाव पक्ष की ओर से इस हाई-प्रोफाइल मुकदमे की पैरवी वाराणसी के वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ त्रिपाठी के माध्यम से की गई। इसके साथ ही अदालत में एडवोकेट गुलाम गौश खान और एडवोकेट आसिफ उमर के मजबूत कानूनी तर्कों और साक्ष्यों को प्रस्तुत किया गया। इन अधिवक्ताओं की दलीलों से पूरी तरह संतुष्ट होकर न्यायालय ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त करने का आदेश जारी किया।

क्या था साल 2005 का ‘ज्ञानवापी बवाल’ मामला?

बरी हुए गुलशन कपूर ने घटनाक्रम की पृष्ठभूमि की जानकारी देते हुए बताया कि यह पूरा मामला साल 2005 का है, जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार थी।

विवाद की शुरुआत: ज्ञानवापी परिसर में जुमे की नमाज पढ़ने जाते समय मौलाना बातिन की सुरक्षा जांच को लेकर पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच मामूली कहासुनी हुई थी।

बवाल में तब्दील: यह मामूली बहस धीरे-धीरे उग्र हो गई और देखते ही देखते इसने एक भयंकर बवाल और दंगे का रूप ले लिया। इस दौरान चौक और गोदौलिया इलाके में जबरदस्त पथराव हुआ और सरकारी संपत्ति को भारी क्षति पहुंचाई गई थी।

बेगुनाहों पर दर्ज हुआ मुकदमा: आरोप है कि तत्कालीन प्रशासनिक अराजकता और दबाव के बीच अपनी साख बचाने के लिए पुलिस ने बेगुनाह स्थानीय मुस्लिम व्यापारियों और भाजपा नेताओं को नामजद करते हुए संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया था। इस मामले में सभी आरोपियों को जेल भी जाना पड़ा था।

इन प्रमुख चेहरों को मिली बड़ी राहत

इस राजनीतिक और सांप्रदायिक मोड़ ले चुके मुकदमे में वरिष्ठ भाजपा नेता शंकर गिरी, गुलशन कपूर समेत कुल 7 हिंदू नेताओं और 9 स्थानीय मुस्लिम व्यापारियों को आरोपी बनाया गया था। 21 वर्षों तक कोर्ट के चक्कर काटने के बाद अब दोनों समुदायों के इन निर्दोष लोगों को कोर्ट से क्लीन चिट मिल गई है।

ज्ञानवापी से जुड़े इस पुराने विवाद पर कोर्ट का यह फैसला काशी की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। बरी हुए नेताओं और व्यापारियों के समर्थकों ने कचहरी परिसर में एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया है।

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