निजी अस्पतालों के लिए काम कर रहीं सरकारी आशा बहुएं, गोपनीय बैठक में मरीज भेजने का लिया संकल्प; भोज के साथ उपहार बांटने की चर्चा

जौनपुर

जौनपुर जनपद के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सोंधी से जुड़ी आशा बहुओं और आशा संगिनियों की कार्यशैली को लेकर क्षेत्र में गंभीर सवाल उठने लगे हैं।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

जौनपुर जनपद के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सोंधी से जुड़ी आशा बहुओं और आशा संगिनियों की कार्यशैली को लेकर क्षेत्र में गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को घर-घर पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाने वाली कुछ आशा बहुएं निजी अस्पतालों से सांठगांठ कर गरीब मरीजों को वहां भर्ती कराने के खेल में शामिल हैं।

पीएचसी सोंधी क्षेत्र के अंतर्गत कुल 260 आशा बहुएं और 12 आशा संगिनियां कार्यरत हैं, जिन्हें स्वास्थ्य विभाग की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। सरकार द्वारा इन्हें फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में मानदेय भी दिया जाता है ताकि ये गर्भवती महिलाओं की देखभाल, नियमित टीकाकरण, परिवार नियोजन और ग्रामीणों को सरकारी मुफ्त इलाज से जोड़ सकें। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ आशा कर्मी निजी स्वार्थ और कमीशन के चक्कर में गरीब मरीजों को सरकारी अस्पतालों में ले जाने के बजाय निजी नर्सिंग होम में भर्ती करा रही हैं।

बिना मोबाइल और ड्रेस के बुलाई गई गोपनीय बैठक

चर्चा है कि सोमवार को शाहगंज नगर स्थित एक निजी अस्पताल में आशा संगिनियों के नेतृत्व में एक बेहद गोपनीय बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में आशा बहुओं को निजी अस्पतालों में ज्यादा से ज्यादा मरीज भेजने के लिए प्रेरित किया गया। मामले को दबाए रखने के लिए सख्त निर्देश थे कि कोई भी आशा कर्मी अपने आधिकारिक ड्रेस कोड में नहीं आएगी और बैठक के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। सूत्रों के मुताबिक, बैठक के बाद एक विशेष भोज का आयोजन किया गया और शामिल होने वाली आशाओं को मोटी नकदी व महंगे उपहार भी बांटे गए।

नॉर्मल डिलीवरी की जगह ऑपरेशन का दबाव

क्षेत्रीय ग्रामीणों का गंभीर आरोप है कि ये आशा कर्मी गांवों से सीधे-साधे मरीजों को बेहतर और सरकारी इलाज का झांसा देकर निजी अस्पतालों में ले जाती हैं, जहां उनसे इलाज और जांच के नाम पर मनमाना शुल्क वसूला जाता है। हद तो तब हो जाती है जब सामान्य प्रसव (नॉर्मल डिलीवरी) के मामलों में भी परिजनों पर सिजेरियन (ऑपरेशन) कराने का दबाव बनाया जाता है, ताकि अस्पताल को मोटा आर्थिक लाभ हो और बदले में इन आशा कर्मियों को तगड़ा कमीशन मिल सके। चर्चा तो यहां तक है कि क्षेत्र के कई निजी अस्पताल डॉक्टरों या अपनी साख के भरोसे नहीं, बल्कि इसी ‘आशा नेटवर्क’ के सहारे फल-फूल रहे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले और गंभीर आरोपों पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

 

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