संसद विशेष: कालानमक चावल को वैश्विक पहचान दिलाने की कवायद, ₹663 करोड़ का हुआ निर्यात

नई दिल्ली

नई दिल्ली: सिद्धार्थनगर और तराई क्षेत्र की गौरव कही जाने वाली ‘कालानमक चावल’ की सुगंध अब सात समंदर पार तक पहुँच रही है। पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

नई दिल्ली: सिद्धार्थनगर और तराई क्षेत्र की गौरव कही जाने वाली ‘कालानमक चावल’ की सुगंध अब सात समंदर पार तक पहुँच रही है। मंगलवार, 10 फरवरी 2026 को लोकसभा में सांसद जगदम्बिका पाल द्वारा पूछे गए एक अनस्टार्ड प्रश्न (संख्या 1691) के जवाब में सरकार ने इस स्वदेशी अनाज की वैश्विक प्रगति का ब्यौरा साझा किया।

निर्यात के लिए बना अलग टैरिफ कोड

सांसद जगदम्बिका पाल के प्रश्न पर सरकार ने जानकारी दी कि 1 मई 2025 से जीआई (GI) मान्यता प्राप्त चावल के लिए अलग टैरिफ कोड लागू कर दिया गया है। इस कदम से कालानमक जैसे विशिष्ट चावलों के निर्यात का सटीक डेटा मिलना शुरू हो गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से नवंबर 2025 के बीच जीआई मान्यता प्राप्त गैर-बासमती चावल का कुल निर्यात 76.95 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹663.93 करोड़) तक पहुँच गया है।

किसानों की आय बढ़ाने हेतु सरकारी प्रयास

सरकार ने स्पष्ट किया कि कालानमक चावल की ब्रांडिंग के लिए एपीडा (APEDA) के माध्यम से कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं:

अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन: वैश्विक फूड फेयर में कालानमक चावल का प्रदर्शन और प्रचार।

वित्तीय एवं तकनीकी सहायता: निर्यातकों और सप्लाई चेन स्टार्टअप्स को वित्तीय मदद।

अनुसंधान एवं प्रशिक्षण: किसानों को आधुनिक खेती और बेहतर गुणवत्ता के लिए प्रशिक्षित करना।

‘लोकल टू ग्लोबल’ का सपना हो रहा साकार

श्री पाल ने सदन में कहा कि वर्ष 2012 में जीआई टैग मिलने के बाद से इस चावल ने पूर्वांचल की कृषि पहचान को मजबूत किया है। इसके निर्यात से न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि भारत की पारंपरिक कृषि विरासत को भी वैश्विक मंच मिलेगा। यह पहल प्रधानमंत्री के ‘लोकल टू ग्लोबल’ के विजन को धरातल पर उतारने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

 

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