ब्यूरो रिपोर्ट
आज जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने का सपना देख रहा है।पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

आज जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने का सपना देख रहा है, तब भी देश के दो सबसे बड़े और महत्वपूर्ण वर्ग—युवा और किसान बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं। रोजगार के मोर्चे पर निराशा और कृषि क्षेत्र में खाद की किल्लत, ये दो ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे तौर पर सरकारी नीतियों और उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करते हैं।
बताते चले की युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र का भविष्य होती है, लेकिन आज यही शक्ति सबसे अधिक हताश है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल पा रहा है।सरकारी भर्तियों में देरी सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती प्रक्रियाएं सालों तक लंबित रहती हैं, जिससे युवाओं की ऊर्जा और उम्मीदें खत्म होती हैं।निजी क्षेत्र में धीमी वृद्धि: वैश्विक और राष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियों के कारण निजी क्षेत्र में भी पर्याप्त नई नौकरियों का सृजन नहीं हो रहा है।
कौशल और मांग में अंतर: शिक्षा व्यवस्था अक्सर बाजार की वास्तविक मांगों (Skills required) से मेल नहीं खा पाती, जिससे लाखों युवा ‘डिग्रीधारी बेरोजगार’ बन जाते हैं।
सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं चला रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का लाभ बड़े उद्योगों तक सीमित है। छोटे और मध्यम उद्यम (MSMEs), जो सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करते हैं, आज भी नीतियों के जटिल जाल और पर्याप्त वित्तीय समर्थन की कमी से जूझ रहे हैं। जब तक MSMEs को बल नहीं मिलता, रोजगार के बड़े अवसर पैदा होना मुश्किल है।
अन्नदाता का संघर्ष, खाद की किल्लत और वादाखिलाफी
एक तरफ युवा निराशा से घिरा है, तो दूसरी तरफ देश का अन्नदाता, किसान, हर फसल सीजन में खाद (उर्वरक) की किल्लत से जूझता है। सरकारें कृषि को प्राथमिकता देने का दावा करती हैं, लेकिन जब किसान को बुवाई के चरम समय में यूरिया या डीएपी नहीं मिलती, तब ये दावे खोखले लगने लगते हैं।
किल्लत होते ही खाद की कालाबाजारी शुरू हो जाती है, जिससे किसान को सब्सिडी वाले उत्पाद के लिए भी दोगुनी कीमत चुकानी पड़ती है।
सही समय पर उर्वरक न मिलने से फसल का उत्पादन घट जाता है, जिसका सीधा असर किसान की आय और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
किसानों को केवल रियायतें नहीं, बल्कि समय पर इनपुट (खाद, बीज), सही दाम (MSP) और बाजार तक आसान पहुँच की जरूरत है।
आगे की राह: नीति और नीयत का तालमेल
युवा और किसान दोनों ही देश की अर्थव्यवस्था के पहिए हैं। इन्हें नजरअंदाज करके विकास का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।
रोजगार के लिए भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी और समयबद्ध करना होगा। साथ ही, शिक्षा प्रणाली को उद्योगों की जरूरत के हिसाब से ढालने के लिए ‘स्किल इंडिया’ मिशन को केवल कागजों से निकालकर कार्यशालाओं तक पहुंचाना होगा।
किसानों के लिए खाद वितरण प्रणाली को डिजिटल और पारदर्शी बनाकर कालाबाजारी पर सख्ती से लगाम लगानी होगी। साथ ही, कृषि अनुसंधान और सिंचाई के बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश की आवश्यकता है।
सरकार की नीयत में शायद कोई कमी न हो, लेकिन नीतियों के कार्यान्वयन और उनके जमीनी असर में बड़ा अंतर है। वक्त आ गया है कि सरकार चुनावी घोषणाओं से आगे बढ़कर, इन दो महत्वपूर्ण वर्गों के लिए स्थायी और प्रभावी समाधान प्रदान करे, ताकि देश का हर युवा और किसान आत्मविश्वास के साथ भारत के विकास में भागीदार बन सके।
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— Voice of News 24 (@VOfnews24) December 9, 2025





















