लखनऊ:समर कैंप में खिला लोककला का रंग: ऐपण से सजी आरती की थाली

लखनऊ

लखनऊ के बच्चों ने सीखी उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला, रचनात्मकता और सांस्कृतिक चेतना का सुंदर संगम।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट 

लखनऊ राजकीय हाईस्कूल मस्तेमऊ, गोसाईगंज में चल रहे ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर ने इस बार एक पारंपरिक लोककला को आधुनिक स्पर्श देते हुए बच्चों की रचनात्मकता को नए आयाम दिए। उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को शिविर का हिस्सा बनाकर न केवल विद्यार्थियों को कलात्मक अभिव्यक्ति का मंच दिया गया, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास भी किया गया।

यह समर कैम्प 21 मई से 10 जून तक जिला विद्यालय निरीक्षक श्री राकेश कुमार पाण्डेय के संरक्षण में संचालित किया गया। इस अवधि में छात्रों ने चित्रकला, संगीत, हस्तशिल्प जैसे विविध क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्राप्त किया, लेकिन विशेष आकर्षण बना ऐपण कला पर आधारित आरती की थाली निर्माण।

ऐपण: परंपरा से नवाचार तक

उत्तराखंड की भूमि पर जन्मी ऐपण कला मूलतः घरों के आँगन या पूजास्थलों को सजाने की पारंपरिक शैली रही है, जिसमें गेरु से रंगी भूमि पर चावल के घोल से ज्यामितीय एवं देवी-देवताओं से जुड़े चित्र बनाए जाते हैं। इस शिविर में प्रशिक्षिका कु. पूर्विका पाण्डेय ने इस पारंपरिक कला को नया रूप देते हुए छात्रों को स्टील की थालियों पर ऐपण डिजाइन से आरती की थाली सजाने का प्रशिक्षण दिया।

इस अनोखे प्रयोग ने बच्चों को परंपरा और नवाचार के बीच सेतु बनाते हुए एक नई दृष्टि और प्रेरणा दी।

बच्चों की रचनात्मकता ने पाया नया विस्तार:

कला प्रशिक्षण के दौरान न केवल विद्यार्थियों ने इस कला को सीखा, बल्कि प्रधानाचार्य श्रीमती कुसुम वर्मा और शिक्षिका श्रीमती सपना सिंह ने भी इसमें रुचि दिखाई और अपनी आरती थालियाँ स्वयं सजाईं। बच्चों के चेहरों पर रचनात्मकता की चमक और संस्कृति से जुड़ाव का गर्व स्पष्ट झलक रहा था।

शिविर में भाग लेने वाली छात्रा नेहा सिंह ने कहा, “ऐपण बनाना हमारे लिए पहले किताबों की चीज़ थी, लेकिन अब हमने इसे अपने हाथों से अनुभव किया है।”

सांस्कृतिक धरोहर का पुनर्जीवन

इस आयोजन ने न सिर्फ बच्चों को कलात्मक दक्षता प्रदान की, बल्कि उनमें अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान और जागरूकता भी उत्पन्न की। ऐसे शिविर आज के दौर में विशेष महत्व रखते हैं, जब सांस्कृतिक मूल्य तकनीक की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं।

ऐपण जैसी परंपराएं केवल कला नहीं, एक सांस्कृतिक पहचान होती हैं, और जब इन्हें विद्यालयों में जीवित किया जाता है, तो यह मात्र प्रशिक्षण नहीं — संस्कार और उत्तरदायित्व का समवेत प्रयास बन जाता है।

इस प्रकार के रचनात्मक आयोजनों के ज़रिए विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना, सौंदर्यबोध और लोक-परंपराओं के प्रति गहरा जुड़ाव भी उत्पन्न कर सकते हैं।

 

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