“पुलवामा के रणबांकुरों का बलिदान: जब प्रेम दिवस पर वतन के आशिकों ने लहू से लिखी वफादारी की अमर इबारत।”

ब्यूरो रिपोर्ट

कैलेंडर पर 14 फरवरी की तारीख आते ही दुनिया ‘प्रेम’ की बातें करने लगती है, गुलाब और तोहफों के साथ वफादारी की कसमें खाई जाती हैं। लेकिन, भारत के लिए यह तारीख केवल गुलाब की खुशबू वाली नहीं, बल्कि पुलवामा की मिट्टी में मिली वीर जवानों के खून की महक वाली है।

साल 2019 का वो मनहूस मंजर

आज से ठीक 7 साल पहले, जब देश के कुछ युवा अपने प्रेम का इजहार कर रहे थे, ठीक उसी वक्त कश्मीर की वादियों में भारत माता के 40 सच्चे सपूत अपनी वफादारी का सबसे बड़ा सबूत दे रहे थे। कायरों ने पीछे से वार किया, धमाका हुआ और पल भर में चारों ओर चीख-पुकार मच गई। वे जवान, जो अपनों से मिलने के वादे कर घर से निकले थे, अपनी मिट्टी से किए वादे को निभाने के लिए सदा के लिए सो गए।

मोहब्बत का असली सबूत: कफन में लिपटा तिरंगा

दुनिया प्रेम में चांद-तारे मांगती है, लेकिन उन जांबाज सिपाहियों ने ‘सच्ची मोहब्बत’ का वो सबूत दिया जिसकी मिसाल सदियों तक दी जाएगी। लोग सबूत मांगते रहे और हमारे वीर सिपाही तिरंगा ओढ़कर घर वापस आ गए।

“सच्ची मोहब्बत का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि किसी ने महबूब की बाहों के बजाय मौत को गले लगाया ताकि देश चैन से सो सके।”

गम के बादल और फक्र का आंसू

आज जब चारों ओर प्रेम के उत्सव की चर्चा है, तब उन घरों के आँगन सूने हैं जहाँ से उठी अर्थियों ने पूरे देश को रुला दिया था। उन मांओं की आंखें आज भी पथराई हुई हैं जिनके लाल ‘वैलेंटाइन’ के शोर में भारत माता की गोद में सो गए।

हम प्रेम दिवस कैसे मनाते, जब सरहद पार से आई गोलियों ने अपनों के सीने छलनी कर दिए थे? आज उन 40 सीआरपीएफ जवानों को नमन करने का दिन है, जिन्होंने साबित किया कि इश्क अगर वतन से हो, तो वह अमर हो जाता है।

शत-शत नमन उन शहीदों को, जो तिरंगा ओढ़कर आए थे।

 

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