ब्यूरो रिपोर्ट
होली के एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। इसके पिछे की पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट

वर्ष 2025 में होली 14 मार्च को पूरे देश भर में मनाई जानी है। इससे पहले यानी 13 मार्च को होलिका दहन का त्योहार मनाया जाना है।
आइए जानें होलिका दहन का इतिहास
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, जो भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद और असुर राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका की कथा से जुड़ी है, जिसमे होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो जाती है,जबकि प्रह्लाद बच जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार
हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी असुर राजा था जो भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था और उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन, उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश की, लेकिन प्रह्लाद हमेशा भगवान विष्णु में आस्थावान रहा। अंत में, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका, जिसे अग्नि में जलने से वरदान प्राप्त था, से मदद मांगी और उसने प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया.
लेकिन, प्रह्लाद की भक्ति और भगवान विष्णु की कृपा से, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। तभी से, होलिका दहन का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन के दौरान जलती लकड़ियों से वातावरण में फैले जीवाणु खत्म हो जाते हैं और अलाव की गर्मी से शरीर पर जमे कीटाणु भी मर जाते हैं, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है।
होलिका दहन के बाद
अगले दिन यानी होलिका दहन के बाद रंग वाली होली खेली जाती है, जिसमें लोग एक-दूसरे पर रंग-गुलाल लगाकर मस्ती करते हैं और अपने रिश्ते की डोर को रंग-गुलाल के जरिए मजबूत करते हैं।
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— Voice of News 24 (@VOfnews24) March 10, 2025


















