प्रयागराज

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तैयारियों और निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज़ 24 की खास रिपोर्ट।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तैयारियों और निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को कड़ा निर्देश देते हुए आदेश दिया है कि प्रदेश में तीन महीने के भीतर ग्राम पंचायत चुनाव की प्रक्रिया पूरी कराई जाए। इसके साथ ही, अदालत ने नई पंचायतों के गठन तक निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने की व्यवस्था को भी हरी झंडी दे दी है।
तीन घंटे की लंबी बहस के बाद सुरक्षित रखा था फैसला
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्य सरकार द्वारा निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक नामित करने के निर्णय और चुनाव में हो रही देरी को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। यह याचिकाएं अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन, दशरथ यादव एवं अन्य की ओर से दायर की गई थीं।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ के समक्ष इस मामले पर करीब तीन घंटे तक मैराथन सुनवाई चली थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाते हुए पीठ ने स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित कर दी है।
रोजमर्रा के विकास कार्य नहीं होंगे बाधित: प्रशासक संभालेंगे कामकाज
हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार, जब तक निर्वाचन प्रक्रिया संपन्न होकर नई पंचायतों का विधिवत गठन नहीं हो जाता, तब तक निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में अपनी सेवाएं देते रहेंगे। इस अंतरिम व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चुनावी अवधि के दौरान गांवों में विकास कार्य और बुनियादी नागरिक सेवाएं प्रभावित न हों।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के मद्देनजर राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अंतिम मतदाता सूची पहले ही जारी की जा चुकी है। अब हाई कोर्ट का आदेश आने के बाद सरकार और चुनाव आयोग को जल्द ही सीटों के आरक्षण और मतदान की तिथियों के कार्यक्रम की घोषणा करनी होगी।
सरकार ने तय की थी 6 महीने की अंतरिम व्यवस्था
उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने के बाद 27 मई 2026 से एक अंतरिम व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया था। इसके तहत राज्य के सभी जिलाधिकारियों को अधिकृत किया गया था कि वे निवर्तमान प्रधानों को नई पंचायतों के गठन तक या अधिकतम 6 महीने की अवधि के लिए प्रशासक नियुक्त करें, ताकि प्रशासनिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न न हो।
प्रशासकों के अधिकारों पर रहेगा सख्त पहरा
अदालत और शासन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे निवर्तमान प्रधानों को केवल सीमित प्रशासनिक अधिकार ही प्राप्त हैं .
सीमित अधिकार: प्रशासक केवल रोजमर्रा के आवश्यक कार्य—जैसे गांव की नियमित साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट की मरम्मत और जारी जनकल्याणकारी योजनाओं की सामान्य निगरानी ही संभाल सकते हैं।
वित्तीय पाबंदियां: प्रशासकों को कोई भी बड़ा नीतिगत निर्णय लेने, नई परियोजनाएं या योजनाएं स्वीकृत करने और बड़े वित्तीय लेनदेन करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सियासी सरगर्मी एक बार फिर तेज हो गई है और सभी राजनीतिक दलों व भावी प्रत्याशियों की नजरें अब चुनाव आयोग द्वारा जारी होने वाली अधिसूचना पर टिक गई हैं।
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— Voice of News 24 (@VOfnews24) October 14, 2026













