महराजगंज: हर साल लाखों का बजट साफ, फिर भी किसानों के लिए ‘काल’ बना नेपाल से आने वाला महाव नाला,2013 से अब तक दर्जनों बार टूट चुका है तटबंध; कटी फसलें और डूबे गांव बयां कर रहे सिंचाई विभाग की लापरवाही की दास्तान

नौतनवां

महराजगंज जनपद के नौतनवां तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती इलाकों के किसानों के लिए नेपाल की पहाड़ियों से निकलने वाला ‘महाव नाला’ हर साल मानसून के आते ही तबाही का दूसरा नाम बन जाता है।पूरी जानकारी के लिए पढ़िए वाॅइस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

महराजगंज जनपद के नौतनवां तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती इलाकों के किसानों के लिए नेपाल की पहाड़ियों से निकलने वाला ‘महाव नाला’ हर साल मानसून के आते ही तबाही का दूसरा नाम बन जाता है। करोड़ों रुपये के बजट, सिल्ट सफाई के बड़े-बड़े दावों और हर साल होने वाली मरम्मत के बावजूद आज तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका है। क्षेत्र के हजारों पीड़ित किसानों का सीधा आरोप है कि सिंचाई विभाग द्वारा तटबंधों  का निर्माण और मरम्मत मानकों के अनुरूप और गुणवत्तापूर्ण न कराए जाने के कारण पहली ही बारिश का हल्का दबाव भी यह बांध झेल नहीं पाता और भरभराकर टूट जाता है।

विगत 13 वर्षों का खौफनाक रिकॉर्ड: सरकारी फाइलें दुरुस्त, जमींदोज फसलें

प्राप्त आंकड़ों और रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2013 से लेकर अब तक महाव नाले का मुख्य तटबंध दर्जनों बार अलग-अलग स्थानों पर टूट चुका है। हालिया वर्षों की बात करें तो वर्ष 2023, 2024, 2025 और अब चालू वर्ष 2026 में भी मानसून की शुरुआत में ही तटबंध टूटने से दर्जनों गांवों में बाढ़ का पानी घुस गया है, जिससे धान की नर्सरी और खरीफ की अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। हर साल आपदा आने के बाद प्रशासनिक अमला जागता है, राहत सामग्री बंटती है, लेकिन बाढ़ की जड़ पर प्रहार करने की जहमत कोई नहीं उठाता।

नेपाल से कनरी चकरार के रास्ते भारत में प्रवेश: समझिए तबाही का भूगोल

महाव नाला नेपाल की पहाड़ियों से भीषण वेग के साथ निकलकर नौतनवां क्षेत्र के कनरी चकरार गांव के समीप भारतीय सीमा में प्रवेश करता है। इसके बाद यह बरगदवा, परसा मलिक क्षेत्र और सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग जंगल क्षेत्र से होते हुए प्यास नदी में जाकर विलीन हो जाता है।

भारतीय सीमा में इसकी कुल लंबाई लगभग 23 किलोमीटर है, जिसमें से करीब 8 किलोमीटर का हिस्सा घने सोहगीबरवा जंगल से गुजरता है। इस पूरे रूट में 65 से अधिक तीखे और खतरनाक मोड़ हैं। जंगल क्षेत्र में नदी का तल बेहद संकरा और बहाव टेढ़ा-मेढ़ा होने के कारण बाढ़ के समय पानी का तीव्र दबाव सीधे मिट्टी के तटबंधों पर पड़ता है, जिससे वे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।

लेटलतीफी और खानापूर्ति की भेंट चढ़ती ‘सिल्ट सफाई’

ग्रामीणों ने सिंचाई विभाग के कार्यप्रणाली की पोल खोलते हुए बताया कि नाले की सिल्ट (मिट्टी-बालू) सफाई का कार्य कभी भी समय पर शुरू नहीं किया जाता। जब बरसात सिर पर आ जाती है, तब बजट ठिकाने लगाने के लिए जल्दबाजी में जेसीबी मशीनें उतारकर खानापूर्ति की जाती है। बरसात के पानी के बीच न तो नाले की गहराई बढ़ पाती है और न ही निकाली गई गीली मिट्टी से तटबंध मजबूत हो पाते हैं। इसका सीधा खामियाजा अन्नदाता को अपनी सालभर की मेहनत गंवाकर भुगतना पड़ता है।

तटबंध टूटने से तबाही की जद में आने वाले प्रमुख गांव

पूर्वी तटबंध टूटने पर: बरगदवा, देवघट्टी, हरखपुरा, शिकारगढ़, नारायनपुर, हरपुर, अमहवा, बेलहिया, खजहिया और गणेशपुर समेत कई गांव टापू बन जाते हैं।

पश्चिमी तटबंध टूटने पर: खैरहवा दूबे, कोहरगड्डी, असुरैना, दोगहरा, विशुनपुरा, जहरी, सागरहवा, महरी घोड़हवा, लुठहवा और गंगवालिया जैसे गांवों में भुखमरी और तबाही की स्थिति पैदा हो जाती है।

हालांकि, क्षेत्र के जागरूक किसानों और प्रबुद्ध नागरिकों का साफ कहना है कि जब तक इस पहाड़ी नाले का वैज्ञानिक तरीके से स्थायी निर्माण समय से पूर्व गहरी सिल्ट सफाई और सोहगीबरवा जंगल के संकरे रूट का समुचित तकनीकी प्रबंधन नहीं होगा, तब तक हर साल करोड़ों का सरकारी धन यूं ही पानी में बहता रहेगा। वर्तमान में आसमान में छाए बादलों को देख-देखकर सीमावर्ती इलाकों के हजारों किसान इसी खौफ और आशंका में रातें काट रहे हैं कि न जाने किस रात यह महाव नाला उनकी बची-कुची उम्मीदों को भी बहा ले जाए।

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