ग्लोबल मार्केट में ‘बुद्ध के प्रसाद’ कालानमक की धूम, किसानों को MSP से दोगुना दाम!

सिद्धार्थनगर

पूर्वांचल के 11 जिलों को जीआई टैग प्राप्त और सिद्धार्थनगर के एक जिला एक उत्पाद (ODOP) के रूप में प्रतिष्ठित कालानमक धान का क्रेज देश-दुनिया में अभूतपूर्व तरीके से बढ़ रहा है।पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

पूर्वांचल के 11 जिलों को जीआई टैग प्राप्त और सिद्धार्थनगर के एक जिला एक उत्पाद (ODOP) के रूप में प्रतिष्ठित कालानमक धान का क्रेज देश-दुनिया में अभूतपूर्व तरीके से बढ़ रहा है। इसे भगवान बुद्ध का प्रसाद माने जाने और योगी सरकार द्वारा की गई ब्रांडिंग के बाद इसकी मांग में जबरदस्त उछाल आया है, जिसके परिणामस्वरूप किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से दोगुना दाम मिलने की घोषणा की गई है।

बड़ी मार्केटिंग कंपनी को 20 हजार क्विंटल की जरूरत

एक बड़ी राष्ट्रीय मार्केटिंग कंपनी, जो कालानमक की पैकेजिंग और बिक्री देश के प्रमुख डिपार्टमेंटल स्टोर तथा मॉल में करती है, उसे तत्काल 20 हजार क्विंटल कालानमक धान की आवश्यकता है। यह कंपनी 400 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से इस विशिष्ट चावल की बिक्री कर रही है।

गोरखपुर की संस्था पीआरडीएफ इस मार्केटिंग कंपनी से जुड़ी है। संस्था के चेयरमैन पद्मश्री डॉ. आर सी चौधरी ने हाल ही में मृदा दिवस पर घोषणा की कि वे किसानों को एमएसपी से दोगुना दाम देकर कालानमक धान खरीदेंगे। पीआरडीएफ ने इसका खुदरा मूल्य 170 रुपये प्रति किलोग्राम रखा है, जबकि जैविक चावल के लिए 20% अतिरिक्त मूल्य देने की बात कही है।

बौद्धिस्ट देशों में बढ़ी मांग, कीमत बेअसर

कालानमक चावल के कद्रदान देश-दुनिया में फैले पूर्वांचल के लोग ही नहीं, बल्कि बौद्ध धर्म को मानने वाले देश भी हैं। इसे बुद्ध का प्रसाद माने जाने के कारण थाईलैंड, म्यांमार, सिंगापुर जैसे बौद्धिस्ट देशों में इसकी खासी मांग है। इन देशों में कुछ कंपनियां इसकी मार्केटिंग बुद्धा राइस, बुद्धा होम और रियल होम ऑफ बुद्धा जैसे नामों से कर रही हैं।

कद्रदानों के लिए इसकी कीमत खास मायने नहीं रखती, यही वजह है कि यह बाजार में 300 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम तक बेचा जा रहा है।

कुपोषण से लड़ने का प्रभावी हथियार बनेगा कालानमक

चावल भारत की लगभग 65% आबादी का मुख्य भोजन है। कालानमक चावल न केवल अपनी खुशबू, स्वाद और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के लिए जाना जाता है, बल्कि यह कुपोषण के खिलाफ एक प्रभावी हथियार भी साबित हो सकता है।

कालानमक में परंपरागत चावलों की तुलना में जिंक (दिमाग के लिए जरूरी) और आयरन (एनीमिया रोकने के लिए महत्वपूर्ण) की मात्रा अधिक होती है।

अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र (इरी) वाराणसी और अपेडा के सहयोग से इस पर शोध चल रहा है। इसका उद्देश्य चावल को सीधे खाने वालों तक ही नहीं, बल्कि पास्ता, बिस्किट, आइसक्रीम, ब्रेड और कुकीज जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के जरिए भी इसके पोषक तत्वों का लाभ पहुँचाना है।

सिद्धार्थनगर का कालानमक सर्वोत्तम

शोध संस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों में पैदा होने वाले कालानमक चावल की गुणवत्ता पर शोध कर रही हैं। फिलहाल, खुशबू के लिहाज से सिद्धार्थनगर का कालानमक सबसे बेहतर माना गया है।

योगी सरकार ने इसे ओडीओपी घोषित करने के बाद इसकी ब्रांडिंग में कोई कसर नहीं छोड़ी। कपिलवस्तु में कालानमक चावल महोत्सव का आयोजन किया गया और गुणवत्तापूर्ण प्रसंस्करण के लिए कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC) का निर्माण किया गया है। सीएफसी में स्टोनर मशीन से लेकर शॉर्टेक्स मशीन और कोल्ड स्टोरेज तक की व्यवस्था है, जिससे उत्पादन और पैकेजिंग में अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन किया जा सके।

कालानमक की बढ़ती वैश्विक पहचान से पूर्वांचल के 11 जीआई जिलों (गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और गोंडा) के किसानों के खुशहाल होने की राह खुल गई है।

 

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