सियासत की ‘खानदानी दुकान’ और न्याय का थकता सच

बुलंदशहर

आज के दौर में राजनीति सेवा का माध्यम कम और अकूत कमाई का जरिया ज्यादा नजर आती है। पूरी जानकारी के पढ़िए वाॅयस ऑफ़ न्यूज 24 की खास रिपोर्ट।

आज के दौर में राजनीति सेवा का माध्यम कम और अकूत कमाई का जरिया ज्यादा नजर आती है। विडंबना देखिए कि जिन नेताओं को जनता अपनी किस्मत बदलने के लिए चुनती है, वे अपनी ही तिजोरियां भरने के ‘सेटिंग’ के खेल में मशगूल हो जाते हैं। घपले, घोटाले और गलत फैसलों की ढाल बनाकर सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ मजबूत रखना ही इनका एकमात्र लक्ष्य बनकर रह गया है।

अदालती तारीखें और रसूख का खेल

न्याय की प्रक्रिया में ‘तारीख पर तारीख’ का अंतहीन सिलसिला इन रसूखदारों के लिए सबसे सुरक्षित कवच साबित होता है। मामला निचली अदालत से शुरू होकर ऊपरी अदालतों तक वर्षों खिंचता रहता है। आलम यह है कि जब तक कानून किसी नतीजे पर पहुँचने की कोशिश करता है, तब तक सच खुद थक कर हार मान चुका होता है। रसूखदार लोग बीमारी या बुढ़ापे का सहारा लेकर सजा से बच निकलते हैं या फिर बड़े अस्पतालों के वातानुकूलित कमरों को ही अपनी जेल बना लेते हैं।

आम आदमी का टैक्स और वीआईपी ऐश-ओ-आराम

एक तरफ आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा टैक्स के रूप में भरता है, वहीं दूसरी तरफ उसी पैसे से नेता और उनके परिवार विदेशों में पढ़ाई और आलीशान बंगलों का आनंद लेते हैं। जनता के लिए बने सरकारी अस्पतालों की बदहाली पर भाषण देने वाले ये नेता खुद बीमार पड़ते ही विदेश का टिकट कटा लेते हैं। यहाँ पैसा और रसूख, कानून से भी ज्यादा ताकतवर नजर आने लगता है।

लोकतंत्र के नाम पर ‘पारिवारिक विरासत’

सबसे दुखद पहलू यह है कि किसी नेता के जाने के बाद भी यह खेल खत्म नहीं होता। मौत के बाद भी सहानुभूति की राजनीति की जाती है और जनता की भावनाओं को भुनाकर उन्हीं के किसी रिश्तेदार को सत्ता की कुर्सी पर बैठा दिया जाता है। यह स्थिति देखकर महसूस होता है कि हम लोकतंत्र में नहीं, बल्कि किसी ‘खानदानी दुकान’ के दौर में जी रहे हैं, जहाँ सेवा का जज्बा गायब है और केवल विरासत का बोझ जनता पर थोपा जा रहा है।

समय आ गया है कि जनता इस चक्रव्यूह को समझे और जवाबदेही की मांग करे, ताकि राजनीति फिर से ‘सेवा’ के अपने मूल स्वरूप में लौट सके।

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