चुनाव के चर्चे,चुनाव के मुद्दे लेखक विद्यानाथ मणि त्रिपाठी की कलम से अपने अंदाज मे

Voice Of News 24

21 May 2024 10:41 AM

चुनावी मौसम चल रहा हमारे संसदीय क्षेत्र में भी प्रत्याशीयो ने पर्चा भर दिया है और अब क्षेत्रों में अपने अपने कार्यालय का उद्घाटन करने और वोटरों को रिझाने की कोशिश में लग गये है ।

अब उन भाईयों की मौज है जो सबकी जिम्मेदारी उठाते है।।लोकतंत्र  के इस पर्व में पीने पिलाने और लुभाने की कोशिश वो लोग करेंगे जो पिछले चार साल नजर नहीं आए

मुल मुद्दे गायब है बात उन मुद्दों पर हो रही है जिनसे आम जन का सरोकार नहीं जैसे हमारे धानी क्षेत्र से जिला मुख्यालय तक आने जाने के लिए बस की सुविधा नहीं और बात हो रही मुख्यालय को रेल मार्ग से जोड़ने की ।

फरेंदा चीनी मिल चालू कराना पिछले पच्चीस साल से इंतजार कर रहा है और अब तो इस विषय पर बात नहीं होती बात हो रही है पांच किलो अनाज और सिलेंडर की शौचालय की।

अरे जब व्यक्ति का रहने सहन ऊंचे स्तर पर बढ़ता है तो व्यक्ति इसकी व्यवस्था स्वयं कर लेता है जबकि खैरात में मिलने पर सुखी लकड़ी शौचालय में और सिलेंडर पैसा न होने के कारण शोपीस बन जाता है और बुलेट मोटरसाइकिल से लोग राशन छुड़ा कर बेच कर दारु चिकना का इंतजाम कर लेते हैं।

एक हैं जिन्होंने पिछले पच्चीस सालों से महाराजगंज को बंधक बना रखा है और पुरे विकास को जिलामुख्यालय,घुघली सिसवा तक सीमित कर रखा है

फरेंदा कभी उनकी प्रायरिटी में नहीं रहा और धानी की बात ही इससे भिन्न नहीं दुसरे महानुभाव है तो उनसे विधायकी ही मुश्किल थी पांच बार अलग अलग दलों को आजमाया लेकिन हमेशा दूसरे तीसरे पर रहे लेकिन इस बार ऐटीइंकबेसी फैक्टर काम करने और मंच से दुबारा चुनाव न लड़ने के निवेदन पर जनता ने बेचारा मान उन्हें विधायक बनाया और अब सांसद बनने के लिए मैदान में।

ये दुर्भाग्य है देश का जहां जातिवाद दूर करने की बात तो होती है लेकिन प्रत्याशी जातिगत आधार पर उतारे जाते हैं।

ये समीकरण है महाराजगंज का कि चौधरी बहुल है इसलिए चौधरी प्रत्याशी उतारा गया , जबकि कमंडल का सहारे बनिया बामन और ठाकूर मल्लाह मिल कर भाजपा को निकाल देते हैं।इस फार्मूले को ध्यान रख कर इंडिया गठबंधन ने भी अपना प्रत्याशी उतारा है जिनका आधार है कि चौधरी मतदाता कन्फ्यूज हो कुछ जुटेंगे बाकी मुस्लिम यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग मिलकर परिवर्तन कर सकते हैं।

अब सारा दारोमदार जनता के उपर है वो जनता जो लुभावने नारों से बहक जाती चुनावी जुमलों पर पिघल जाती है दारु साड़ी पैसे पर मचल जाती है और जातिगत समीकरणों से फिसल जाती है ।

            लेखक

  विद्यानाथ मणि त्रिपाठी 

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