जलियांवाला बाग:आजादी के इतिहास का वो काला दिन जो कभी भुलाया नहीं जा सकता,आज भी इसके जख्‍म ताजा से लगते हैं

Voice Of News 24 

13 Apr 2024 14:45 PM

जलियांवाला बाग में घटी इस घटना को आज पूरे 105 वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन आज भी इसके जख्‍म ताजा से लगते हैं और इस दर्दनाक और दुख से भरे दिन को भारत के इतिहास की काली घटना के रूप में याद किया जाता है.इस दिन को कोई भारतीय आज भी भुला नहीं है। किस तरह अंग्रेजोने हम सब पर जुल्म ढाये है।

13 अप्रैल 1919 को ये दुखद घटना घटी थी, जब पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित जलियांवाला बाग में निहत्‍थे मासूमों का कत्‍लेआम हुआ था. अंग्रेजों ने निहत्‍थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं. इस घटना को अमृतसर हत्याकांड के रूप में भी जाना जाता है.

1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से तैयार किया गया रोलेट एक्ट। इस एक्‍ट को जलियांवाला बाग की घटना से करीब एक माह पूर्व 8 मार्च को ब्रिटिश हकूमत ने पारित किया था.इस अधिनियम को लेकर पंजाब सहित पूरे भारत में विरोध शुरू हुआ. विरोध प्रदर्शन के लिए अमृतसर में, जलियांवाला बाग में प्रदर्शनकारियों का एक समूह इकट्ठा हुआ. ये एक सार्वजनिक बाग था, जहां रोलेट एक्ट के खिलाफ शांति से विरोध किया जा रहा था. किसी ने ये नहीं सोचा था की अंग्रेज इस कदर नीची गिर जाएंगे.

इन मासूमों पर जनरल रेजिनल्ड डायर के नेतृत्व में सैनिकों ने जलियांवाला बाग में प्रवेश किया और एकमात्र निकासी द्वार को बंद कर दिया. इसके बाद डायर ने सैनिकों को वहां मौजूद निहत्‍थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाने का आदेश दे दिया.कहा जाता है कि ये गोलाबारी तब तक जारी रही, जब तक कि सैनिकों के गोला-बारूद खत्म नहीं हो गए. इस घटना में कितने लोग शहीद हुए, इसका आज तक पता नहीं. लेकिन माना जाता है करीब 400 से 1,000 लोग मारे गए और 1,200 से अधिक घायल हुए.

रौलट एक्ट के कुछ खास बिंदु

  • इसके जरिए ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को बिना मुकदमा चलाये दो साल तक जेल में बंद रखने का अधिकार मिल गया था. इस कानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था
  • इस एक्ट के तहत, औपनिवेशिक अधिकारियों को बिना किसी मुकदमे के लोगों को कैद करने और हिरासत में लेने की शक्तियां मिल गईं.
  • राजद्रोह के मुकदमों की सुनवाई के लिए एक अलग अदालत बनाई गई.
  • मुकदमे के फ़ैसले के बाद किसी उच्च अदालत में अपील करने का अधिकार नहीं था.
  • राजद्रोह के मुकदमों में जजों को बिना जूरी की मदद से सुनवाई करने का अधिकार मिल गया.
  • सरकार को यह अधिकार मिल गया कि वह बलपूर्वक प्रेस की आज़ादी छीन ले और अपनी मर्ज़ी से किसी व्यक्ति को कारावास दे दे या देश से निकाल दे.

आज भी दीवारों पर मौजूद हैं गोलियों के निशान

आज इस घटना को पूरे 105 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके जख्‍म आज भी भरे नहीं हैं. ब्रिटिश सरकार के इस भयानक कारनामे की का सबूत आज भी दीवारों पर मौजूद है. ब्रिटिश सैनिकों ने जब गोलीबारी की थी तो तमाम गोलियां दीवारों में जा घुसी थीं. उन गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं.

 

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