गरीबी की समस्या : भगवान का सौतेला व्यवहार या अस्तित्व पर संदेह!

ब्यूरो रिपोर्ट

भगवान पर विश्वास, गरीबी की लकीर में इजाफा या फिर आस्था और परंपराओं का बंधन

लोग ऐसा मानते हैं कि, ईश्वर की नजर में सभी एक समान हैं, फिर धरती पर एक-दूसरे में जाति-धर्म, समुदाय तथा गरीब-अमीर का मतभेद क्यों?
यदि तर्क लगाएं तो शायद भगवान के सौतेले व्यवहार का एक मानक पहलू ये भी सामने आ सकता है कि, यदि भगवान के नज़र में जब सभी लोग समान हैं तो लोगों में गरीबी-अमीरी में भिन्नता कैसी? एक परिवार के आंगन में सुखों की बहार, तो दूसरे परिवार के आंगन में दुःखों की प्रकाश का छाया क्यों?
भगवान के समानता की नजर में सौतेलेपन की झलकियों का यह पहलू, वास्तव में ध्यानाकर्षण का एक अनोखा बिन्दु है।
हालांकि भगवान की आस्था न केवल अलग-अलग मतों के सवालों को समेटे हुए है बल्कि ईश्वरीय शक्ति में लोगों का विश्वास, युवा पीढ़ियों को परंपराओं से जोड़े हुए हैं, जो एक हद तक वैज्ञानिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। ये अलग बात है कि ईश्वरीय शक्ति और वैज्ञानिक विचारधाराओं में एकमात्र मतों का विचलन है।

केवल ईश्वरीय आस्था में विश्वास रखने से शायद जीवन सुखमय की राह पर निरंतर नहीं चल सकता,बल्कि आपका कठिन परिश्रम और आपका अपना कर्म ही सुखमय जीवन के पथ पर निरंतर चलने का विश्वास दिलाता है। सुखमय जीवन की राह पर निरंतर चलना,केवल भगवान की आस्था से ही शायद संभव नहीं हो सकता, बल्कि जरिया और आत्मविश्वास को बल दे सकता है।
उक्त विचारों से निष्कर्ष निकलता है कि, केवल धर्म के भरोसे बैठ कर सुखमय जीवन की कल्पना करने से बेहतर है कि अपने कर्म के कंधों को मजबूत बनाकर दूसरे कंधे पर धर्म की विश्वसनीयता में परंपराओं की विकासशीलता को लेकर संतुलन बनाए और आने वाले पीढ़ियों को इन प्रेरणाओं से जोड़े।

 

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